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सोमवार, 19 सितंबर 2011

भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट पर राजनीति

स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी कहा करती थी कि भारत की जनता को सिर्फ दो ही तरीके से मूर्ख मनाया जा सकता है, पहला धर्म और दूसरा क्रिकेट। पता नहीं वे या बात मजाक में कहती थीं या संदीदगी के साथ, लेकिन पिछले दो दशक को देखें तो उनकी कही बात सोलह आने सही है।
आज धर्म के नाम पर क्या-क्या हो रहा है या कहें चल रहा है, बताने की जरूरी नहीं लेकिन क्रिकेट के नाम पर जो हो रहा है, वह सामने है। इंदिराजी के समय भारत और पाकिस्तान के बीच काफी क्रिकेट श्रृंखलाएं आयोजित हुईं। इसका कारण ये रहता था, दोनों देशों की अवाम भले ही दो-तीन महीनों के लिए ही सही, मूलभूत समस्याओं को भूल जाया करती थी।
लेकिन आज हालात बहुत बदले हुए हैं। 'क्रिकेट डिप्लोमेसी' के तहत ही 1987 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक भारत आए थे और उन्होंने जयपुर में भारत-पाकिस्तान का मैच देखा था। 1989 में जिया ने कश्मीर में आग लगाने का जो काम किया था, उसकी तपिश अब तक ‍बरकरार है।
मार्च 2004 में भारत पाकिस्तान के दौरे पर गया था और राजीव शुक्ला के कारण प्रियंका और राहुल गांधी ने लाहौर स्टेडियम में बैठकर मैच देखा। 2005 में राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने फिरोजशाह कोटला मैदान से भारत-पाकिस्तान मैच का आनंद लिया।
 
2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले ने 'क्रिकेट डिप्लोमेसी' को ताक पर रख दिया लेकिन 2011 में विश्वकप का मैच देखने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी मोहाली पहुंचे थे। पाकिस्तान की विदेश मंत्री हीना रब्बानी खार ने अपने पहले भारत दौरे पाकिस्तान और भारत के बी‍च क्रिकेट संबंधों की बहाली की पैरवी की।
यानी सियासी पिच पर क्रिकेट की बातें तो खूब होती हैं लेकिन जब आतंक का मुद्दा आता है तो पाकिस्तान चुप हो जाता है। आखिर भारत बेकसूर लोगों की लाशों के ढेर पर क्रिकेट खेलने का सोच कैसे लेता है? यही आश्चर्य होता है।

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