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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

समुद्री खजाने को लेकर मचा बवाल

अमेरिका की एक अदालत ने एक निजी कंपनी की ओर से समुद्र के नीचे दफन खजाने को निकालने के लिए किए गए दावे को खारिज कर दिया है।

बताया जाता है कि अरबों डॉलर की कीमत का यह खजाना स्पेन की एक जहाज में था जो कि 300 साल पहले कोलंबिया के तटवर्ती इलाके में डूब गया था।

मंगलवार को सुनाए गए आदेश में अमेरिका के जिला जज जेम्स ई बोसबर्ग के अनुसार सीमाओं का कानून अमेरिकी कंपनी सी सर्च आर्मदा की ओर से अनुबंध के उल्लंघन के बाद ही खत्म हो गया था।

वॉशिंग्टन में स्थित खजाना ढूंढने वाली इस कंपनी का पिछले करीब दो दशकों से कोलंबियाई सरकार के साथ खजाने को लेकर मतभेद है। विवाद चार अरब से 17 अरब अमेरिकी डॉलर के बीच की कीमत वाले इस खजाने की हिस्सेदारी को लेकर है।

स्पेन का यह जहाज समुद्र में ब्रिटेन की जंगी जहाजों से बचने की कोशिश करते वक्त साल 1708 में कोलंबिया के निकट डूब गया था।

मामला : आदेशपत्र के अनुसार कोलंबिया में समुद्री मामलों की निगरानी करने वाली एजेंसी ने खोजी कंपनी ग्लोको मोरा को साल 1980 में कोलंबियाई समुद्र में डूबे हुए जहाजों को खोजने के लिए नियुक्त किया था।

साल 1981 में ग्लोको मोरा कंपनी ने खजाने की जगह को चिन्हित कर लिया था और कोलंबियाई सरकार से खजाने की 35 फीसदी भागीदारी की भी बात तय कर ली थी।

लेकिन साल 1984 में सी सर्च आर्मदा को ग्लोको मोरा कंपनी के अधिकार दे दी गई थी। खजाने की 35 फीसदी भागीदारी भी सी सर्च को दे दी गई थी।

हालाकि, कोलंबिया सरकार ने अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। बाद में वहां के विधानमंडल ने सरकार को खजाने के पूरे अधिकार दे दिए। इसके अंतरगत खजाना खोजने वाली कंपनी को खजाने का केवल पांच फीसदी हिस्सेदारी पाने का हकदार बनाया गया।

इस नए कानून के बाद सी सर्च ने कोलंबिया की सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। कोलंबिया के संवैधानिक अदालत ने इस कानून को असंवैधानिक करार दिया था। बाद में कोलंबिया की शीर्ष अदालत ने सी सर्च और सरकार को खजाने का 50-50 फीसदी बंटवारा कर लेने को कहा।

खजाने को अभी तक समुद्र से निकाला नही जा सका है और उसके चिन्हित जगह पर ही मौजूद होने पर भी शंका है। ग्लोको मोरा कंपनी की ओर से साल 1981 में किए गए दावे को जांचने के लिए कोलंबिया सरकार ने एक और कंपनी को नियुक्त किया था जिसे बताए गए जगह पर खजाना नही मिला था।

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

फॉर्मूला वन कार या सड़क पर जेट विमान...

 
एक आधुनिक फार्मूला वन कार इतनी उच्च और परिष्कृत मशीन होती है कि इसकी तुलना लड़ाकू जेट विमान से की जा सकती है। इस खेल को और भी अधिक रोमांचक बनाने के लिए आयोजकों और इसमें हिस्सा ले रही कंपनियों की कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा तेज रफ्तार वाली कारों का निर्माण किया जाए। इस खेल में अनुसंधान और विकास पर हर साल करोड़ों डॉलर निवेश किए जाते हैं।

फॉर्मूला वन कारें ट्रैक पर 200 से 300 किमी प्रति घंटे की गति से रेस करती हैं। हैरानी की बात यह है कि विमान को उड़ान भरने के लिए लगभग 270 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार की जरूरत होती है। टनों वजनी विमान इस गति पर आसानी से उड़ान भर लेता है। 

तो क्या कारण है कि जेट विमान की गति से दौड़ती एफ वन कार टेकऑफ नहीं करतीं? इसके पीछे इंजीनियरिंग की सबसे कुशल तकनीक 'वायुगतिकी' या 'एयरोडायनामिक्स' के सिद्धांत काम करते हैं। उच्च गति पर रेस करती कारों को हवा में टेकऑफ से बचाने के लिए डॉउनफोर्स का इस्तेमाल किया जाता है। कार के सामने-पीछे और अगल-बलग में विंग्स लगाए जाते हैं जिनसे कार को जमीन पर ही बनाए रखने जितना डॉउनफोर्स उत्पन्न होता है।
आधुनिक फ़ॉर्मूला वन कार के हर हिस्से को डिजाइन करते समय एयरोडायनामिक्स का ध्यान रखा जाता है। यहां तक कि ड्रायवर का हेलमेट भी एयरोडायनामिक्स के अनुसार ही बनाया जाता है। इंजिन से निकलने वाली गर्मी को प्रवाहित करने के लिए कार का अधिकतर हिस्सा खुला होता है लेकिन खुले हिस्सों में वायुप्रवाह अवरोधक न बने इसके लिए हर कोण पर खास ध्यान दिया जाता है।
डॉउनफोर्स पैदा करने के लिए इन कारों पर विंग्स लगाए जाते हैं जिससे एफ वन कार ट्रेक पर रहती है। तेज रफ्तार और विंग्स इतना डॉउनफोर्स उत्पन्न करते हैं कि कार किसी सुरंग की छत पर भी उलटा भी चल सकती है। 

इंडियन ट्रैक पर फार्मूला वन कार रेस का रोमांच
पहली बार फार्मूला वन की कारें जब दिल्ली में इंडियन ग्रां.प्री. के दौरान ट्रैक पर रेस लगाने उतरेंगी, तब आयोजक यह मान रहे कि इनमें से कोई न कोई ड्राइवर 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार दर्ज कर सकता है। ग्रां.प्री. सिरीज के तहत यहां पर 30 अक्टूबर को यह रोमाचंकारी रेस होने वाली है और भारतीय दर्शक एक साथ पांच विश्व चैम्पियनों को एफ 1 के अंतर्गत रफ्तार के रंग में देखेंगे।
इसमें कोई शक नहीं कि इंडियन ग्रां.प्री. में रफ्तार का जुनून सिर चढ़कर बोलेगा। इस रेस में 12 टीमें हिस्सा लेंगी जिसमें से 2 टीमें भारतीय रहेंगी। यूं तो एफ वन के ड्राइवरों को रफ्तार से बात करने की पुरानी आदत है लेकिन दिल्ली में बनाए गए एफ 1 ट्रैक में उन्हें भरपूर रोमांच का अनुभव होगा। 2004 में 369.9 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार का समय दर्ज किया जा चुका है जबकि माइकल शूमाकर 233.5 किलोमीटर प्रतिघंटे का वक्त निकाल चुके हैं।
दिल्ली में 320 किलोमीटर की रफ्तार की संभावना इसलिए जताई जा रही है कि ग्रेटर नोएडा में तीन कॉर्नरों की चौड़ाई काफी बढ़ाई गई है ताकि ओवरटेक में बाधा नहीं आए। दुनिया के दूसरे ट्रैक्स की ‍बनिस्बत यहां के कॉर्नर काफी बड़े हैं। सीधी रेस में इसी ट्रैक पर जब 210 की स्पीड आसानी से दर्ज की जा सकती है तो कयास लगाए जा रहे है‍ कि यहां एफ वन के चैम्पियंस 320 की स्पीड पर अपनी एफ 1 को दौड़ा सकते हैं। 

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

भाईदूज का महत्व

भाईदूज

शास्त्रों के अनुसार भैयादूज अथवा यम द्वितीया को मृत्यु के देवता यमराज का पूजन किया जाता है। इस दिन बहनें भाई को अपने घर आमंत्रित कर अथवा सायं उनके घर जाकर उन्हें तिलक करती हैं और भोजन कराती हैं। ब्रजमंडल में इस दिन बहनें भाई के साथ यमुना स्नान करती हैं, जिसका विशेष महत्व बताया गया है। भाई के कल्याण और वृद्धि की इच्छा से बहने इस दिन कुछ अन्य मांगलिक विधान भी करती हैं।
यमुना तट पर भाई-बहन का समवेत भोजन कल्याणकारी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने जाते हैं। उन्हीं का अनुकरण करते हुए भारतीय भ्रातृ परम्परा अपनी बहनों से मिलती है और उनका यथेष्ट सम्मान पूजनादि कर उनसे आशीर्वाद रूप तिलक प्राप्त कर कृतकृत्य होती हैं।

बहनों को इस दिन नित्य कृत्य से निवृत्त हो अपने भाई के दीर्घ जीवन, कल्याण एवं उत्कर्ष हेतु तथा स्वयं के सौभाग्य के लिए अक्षत (चावल) कुंकुमादि से अष्टदल कमल बनाकर इस व्रत का संकल्प कर मृत्यु के देवता यमराज की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात यमभगिनी यमुना, चित्रगुप्त और यमदूतों की पूजा करनी चाहिए। तदंतर भाई के तिलक लगाकर भोजन कराना चाहिए। इस विधि के संपन्न होने तक दोनों को व्रती रहना चाहिए।
दीपोत्सव का समापन दिवस है कार्तिक शुक्ल द्वितीय, जिसे भैयादूज कहा जाता है। इस पर्व के संबंध में पौराणिक कथा इस प्रकार मिलती है। सूर्य की संज्ञा से दो संतानें थीं- पुत्र यमराज तथा पुत्री यमुना। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण अपनी छायामूर्ति का निर्माण कर उसे ही अपने पुत्र-पुत्री को सौंपकर वहां से चली गई। छाया को यम और यमुना से किसी प्रकार का लगाव न था, किंतु यम और यमुना में बहुत प्रेम था।

यमुना अपने भाई यमराज के यहां प्रायः जाती और उनके सुख-दुख की बातें पूछा करती। यमुना यमराज को अपने घर पर आने के लिए कहती, किंतु व्यस्तता तथा दायित्व बोझ के कारण वे उसके घर न जा पाते थे।

एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीय को यमराज अपनी बहन यमुना के घर अचानक जा पहुंचे। बहन यमुना ने अपने सहोदर भाई को बड़ा आदर-सत्कार किया। विविध व्यंजन बनाकर उन्हें भोजन कराया तथा भाल पर तिलक लगाया। यमराज अपनी बहन से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने यमुना को विधिव भेंट समर्पित की। जब वे वहां से चलने लगे, तब उन्होंने यमुना से कोई भी मनोवांछित वर मांगने का अनुरोध किया।


यमुना ने उनके आग्रह को देखकर कहा- भैया! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दीजिए कि आज के दिन प्रतिवर्ष आप मेरे यहां आया करेंगे और मेरा आतिथ्य स्वीकार किया करेंगे।

इसी प्रकार जो भाई अपनी बहन के घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे तथा उसे भेंट दें, उसकी सब अभिलाषाएं आप पूर्ण किया करें एवं उसे आपका भय न हो। यमुना की प्रार्थना को यमराज ने स्वीकार कर लिया। तभी से बहन-भाई का यह त्योहार मनाया जाने लगा।

वस्तुतः इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य है भाई-बहन के मध्य सौमनस्य और सद्भावना का पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखना तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना है। इस प्रकार 'दीपोत्सव-पर्व' का धार्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व अनुपम है।

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

ऑनलाइन लक्ष्‍मी-पूजन करें

Diwali Puja in Hindi
एक बार सनतकुमार ने सभी महर्षि-मुनियों से कहा- महानुभाव! कार्तिक की अमावस्या को प्रातःकाल स्नान करके भक्तिपूर्वक पितर तथा देव पूजन करना चाहिए। उस दिन रोगी तथा बालक के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए। सायंकाल विधिपूर्वक लक्ष्मी का मंडप बनाकर उसे फूल, पत्ते, तोरण, ध्वजा और पताका आदि से सुसज्जित करना चाहिए। अन्य देवी-देवताओं सहित लक्ष्मी का षोड्शोपचार पूजन करना चाहिए। पूजनोपरांत परिक्रमा करनी चाहिए।
मुनिश्वरों ने पूछा- लक्ष्मी पूजन के साथ अन्य देवी-देवताओं के पूजन का क्या कारण है?
सनतकुमारजी बोले- लक्ष्मीजी समस्त देवी-देवताओं के साथ राजा बलि के यहां बंधक थीं। तब आज ही के दिन भगवान विष्णु ने उन सबको कैद से छुड़ाया था। बंधन मुक्त होते ही सब देवता लक्ष्मीजी के साथ जाकर क्षीरसागर में सो गए। इसलिए अब हमें अपने-अपने घरों में उनके शयन का ऐसा प्रबंध करना चाहिए कि वे क्षीरसागर की ओर न जाकर स्वच्छ स्थान और कोमल शय्या पाकर यहीं विश्राम करें। जो लोग लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारियां उत्साहपूर्वक करते हैं, उनको छोड़कर वे कहीं भी नहीं जातीं।

Diwali Puja in Hindi
रात्रि के समय लक्ष्मीजी का आवाहन और विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें नाना प्रकार के मिष्ठान्न का नैवेद्य अर्पण करना चाहिए। दीपक जलाने चाहिए। दीपकों को सर्वानिष्ट निवृत्ति हेतु अपने मस्तक पर घुमाकर चौराहे या श्मशान में रखना चाहिए।

राजा का कर्तव्य है कि नगर में ढिंढोरा पिटवाकर दूसरे दिन बालकों को अनेक प्रकार के खेल खेलने की आज्ञा दे। बालक क्या-क्या खेल सकते हैं, इसका भी पता करना चाहिए। यदि वे आग जलाकर खेलें और उसमें ज्वाला प्रकट न हो तो समझना चाहिए कि इस वर्ष भयंकर अकाल पड़ेगा।

यदि बालक दुःख प्रकट करें तो राजा को दुःख तथा सुख प्रकट करने पर सुख होगा। यदि वे आपस में लड़ें तो राज-युद्ध होने की आशंका होगी। बालकों के रोने से अनावृष्टि की संभावना करनी चाहिए। यदि वे घोड़ा बनकर खेलें तो मानना चाहिए कि किसी दूसरे राज्य पर विजय होगी। यदि बालक लिंग पकड़कर क्रीड़ा करे तो व्यभिचार फैलेगा। यदि वे अन्न-जल चुराएं तो इसका अर्थ होगा कि राज्य में अकाल पड़ेगा।
                                                 ऑनलाइन लक्ष्‍मी-पूजन करें
virtua lpooja


दीपावली का पर्व रोशनी और खुशहाली का प्रतीक है। यह अवसर होता है, अपने इष्‍ट से मनोवांछित फल पाने का। दीपावली पर भक्‍त मां लक्ष्‍मी की आराधना कर मनोवांछित फल पा सकते हैं। अब वेबदुनिया पर आप न केवल मां लक्ष्‍मी के दर्शन, बल्कि विधिपूर्वक पूजन भी कर पाएंगे। वेबदुनिया पर आप ऑनलाइन लक्ष्‍मीजी के दर्शन और पूजन कर सकते हैं।

लक्ष्‍मी-पूजन के लिए यहां पर क्लिक करें।

लक्ष्मी पूजन करने हेतु निम्न निर्देशों का पालन करें।

* पुष्प अर्पण करने हेतु 'पुष्प' पर क्लिक करें।
* फल तथा अन्य सामग्री चढ़ाने के लिए उस पर क्लिक कर के पास माउस की सहायता से लक्ष्मीजी के पास ले जाएं।
* घंटी बजाने के लिए 'घंटी' पर क्लिक करें।
* दीपक से आरती करने के लिए 'दीपक' पर क्लिक कर के पास माउस की सहायता से लक्ष्मीजी के पास ले जाएं।


आतिशबाजी : दीयों की जगमगाती रोशनी के बीच आतिशबाजियों का अपना अलग ही मजा होता है। आपने अब तक इन आतिशबाजियों का खूब लुत्‍फ उठाया होगा, लेकिन यह मजा आप ऑनलाइन भी उठा सकते हैं। इस दीपावली पर वेबदुनिया अपने यूजर्स को ऑनलाइन आतिशबाजियों का लुत्‍फ उठाने का मौका दे रहा है।

रॉकेट छोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

अनार फोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

बम फोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। 


दिवाली : एक मनोरम त्योहार
दीपोत्सव, दीपपर्व, दिवाली, दीपावली। नामों का क्या है, कितने ही रख लें। लेकिन भाव एक ही है। सब शुभ हो, मंगलमयी हो, कल्याणकारी हो। उमंग, उल्लास, उत्कर्ष और उजास का यह सुहाना पर्व एक साथ कितने मनोभाव रोशन कर देता है। हर मन में आशाओं के रंगबिरंगे फूल मुस्करा उठते हैं। भारतीय संस्कृति में कितना-कितना सौन्दर्य निहित है। कहां-कहां से समेटे और कितना समेटे?
Deepawali 2011



खूबसूरत त्योहारों की एक लंबी श्रृंखला है जो किसी रेशमी डोरी की तरह खुलती चली जाती है और मानव मन का भोलापन कि इसमें बंधता चला जाता है सम्मोहित सा। सब भूल जाता है राग, द्वेष, विषाद, संकट, कष्ट और संताप। घर में पधारे हों जब साक्षात आनंद के देवता तो भला कहां सुध अपने दुखों की पोटली को खोलकर बैठने की।
कितनी मनोरम है हमारी भावनाएं कि हम वेदों-पुराणों में वर्णित ज्ञान को संचित करते हुए उसे अपनी कल्पना का हल्का-सा सौम्य स्पर्श देकर अपने लिए खुद ही सौन्दर्य का संसार रच लेते हैं। खुद ही सोच लेते हैं कि पृथ्वी पर अभी गणेशजी पधारें, फिर सोचते हैं मां दुर्गा पधारीं हैं और फिर पौराणिक और लोक-साहित्य की अंगुली थामे प्रतीक्षा करने लगते हैं महालक्ष्मी की।

इनमें झूठ कुछ भी नहीं है, सब सच है अगर अंतरात्मा और दृढ़ कल्पनाशक्ति से किसी दिव्य-स्वरूपा का आह्वान करें तो ईश्वर चाहे प्रकट ना हों लेकिन एक अलौकिक अनुभूति से साक्षात्कार अवश्य करा देतें हैं। हम चाहे कितने ही नास्तिक हों लेकिन इतना तो मानते हैं ना कि कहीं कोई ऐसी 'सुप्रीम पॉवर' है जो इस इतने बड़े सुगठित संसार को इतनी सुव्यवस्था से संभाल रही है।

बस, उसी महाशक्ति को नमन करने, उसके प्रति आभार प्रकट करने का बहाना हैं ये सुंदर, सुहाने सजीले त्योहार। ये त्योहार जो हमें बांधते हैं उस अदृश्य दैवीय शक्ति के साथ, जो हमें जीवन का कलात्मक संदेश देते हैं।


Deepawali 2011



अब दीपावली को ही लीजिए। एक नन्हा सा दीप। नाजुक सी बाती। उसका शीतल सौम्य उजास। झिलमिलाती रोशनियों के बीच इस कोमल दीप का सौन्दर्य बरबस ही मन मोह लेता है। कितना सात्विक, कितना धीर। बेशुमार पटाखों के शोर में भी शांत भाव से मुस्कराता हुआ। टूट कर बिखर-बिखर जाती अनार की रोशन लड़‍ियों के बीच भी जरा नहीं सहमता, थोड़ा-सा झुकता है और फिर तैयार पूरी तत्परता से जहान को जगमगाने के लिए। यही है संदेश दीपों के स्वर्णिम पर्व का।

इस दीपोत्सव पर जब सबसे पहला दीप रोशन करें तो याद करें राष्ट्रलक्ष्मी को। कामना करें कि यह राष्ट्र और यहां विराजित लक्ष्मी, सदैव वैभव और सौभाग्य की अधिष्ठात्री बनी रहें।

दूसरा दीप जलाएं तो याद करें सीमा पर तैनात उन 'कुलदीपकों' को जिनकी वजह से आज हमारे घरों में स्वतंत्रता और सुरक्षा का उजाला है।

तीसरा दीप प्रज्जवलित करें इस देश की नारी अस्मिता के नाम। जो परिवर्तित युग की विकृतियों से जुझते हुए भी जीत की मशाल लिए निरंतर आगे बढ़ रही है। बिना रूके, बिना थके और बिना झुके।

यह 'दिव्यलक्ष्मी' अपने अनंत गुणों के साथ इस धरा पर ना होती तो सोचें कैसे रंगहीन होते हमारे पर्व? श्रृंगारहीन और श्रीहीन? दीपपर्व पर श्रृंगार, सौन्दर्य और सौभाग्य की घर में विराजित देवी के साथ हम सबके आंगन में दिल नहीं दीये जले।

सांसारिक झिलमिलाती रोशनियों के बीच सुकोमल दीप की तरह सदा मुस्कुराएं। और क्यों ना इस बार अपने दीपक आप बन जाएं। 'देह' के दीप में 'आत्मा' की बाती को 'आशा' की तीली से रोशन करें। ताकि महक उठें खुशियों की उजास अपने ही मन ंगन में। इन पंक्तियों के साथ - मंगलकामनाएं...

नेह के छोर से एक दीप हम भेजें
रिश्तों के उस छोर से आप भी सहेजें
झिलमिल पर्व पर खुशियां गुनगुनाएं
आशाओं का रंगीन अनार बिखर-बिखर जाए... !
स्नेहदीप के साथ मधुर शुभकामनाएं !!

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

धनतेरस : विशेष अंक


पांच दिवसीय दीपावली पर्व का प्रारंभ धन त्रयोदशी अथवा धन्वंतरि जयंती के दिन से होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सायंकाल यमराज के निमित्त तेल का दीपक घर के द्वार पर लगाने से असामयिक मृत्यु नहीं होती तथा आरोग्य प्राप्त होता है।

इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अति शुभ माना जाता है। इसके अलावा आभूषण, बहुमूल्य धातुएं, संपत्ति आदि की खरीदी भी लाभकारी होती है।

सोमवार, 24-10-2011 को शुभ मुहूर्त में सराफा और बर्तन बाजार में जमकर खरीदी होगी। भगवान धन्वंतरि का पूजन भी होगा। सुख समृद्धि धन-धान्य की कामना की जाएगी। परिवार में संपत्ति व धन लक्ष्मी की पूजा होगी। वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की दुकानों पर भी भीड़ उमड़ेगी।

धन त्रयोदशी खास मुहूर्त
चौघड़िया मुहूर्

अमृत प्रातः 6.27 से 7.53

शुभ दिन 9.19 से 10.44

चंचल दिन 1.36 से 3.2

लाभ दिन 3.2 से 4.28

अमृत सायं 4.28 से 5.54

चंचल सायं 5.54 से 7.29

लग्न मुहूर्त

वृश्चिक लग्न प्रातः 8.17 से 10.33

कुंभ लग्न दिन 2.25 से 3.59

वृषभ रात्रि 7.10 से 9.8दि. 24-10-2011 
 
धन कमाने के लिए खास तांत्रिक प्रयोग प्रस्तुत है। इस प्रयोग को दीपावली के रात में किया जाता है। इस प्रयोग से किसी तरह की हानि नहीं होती। यह सभी साधारणजन के लिए असरकारी और आसान तांत्रिक प्रयोग है।

इस सरल तांत्रिक प्रयोग को पूर्ण पवित्रता से करने पर लाभ अवश्य मिलता है। लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। धन की वर्षा होती है। रूका पैसा तो मिलता ही है आय के नए-नए साधन भी जुटने लगते हैं। सबसे पहले पूरी शुद्धता से नीचे दिए गए मंत्र की पहले 108 बार माला करें।


धन कमाने के सरल तंत्र-मंत्र
महालक्ष्मी मंत्र -
'ॐ श्रीं ह्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नम:'

सरल वि‍धि :
* चांदी की एक छोटी-सी डिबिया लें। अगर चांदी की उपलब्ध नहीं हो तो किसी और शुद्ध धातु की डिबिया भी आप ले सकते हैं।


* इस डिबिया को आप ऊपर तक नागकेशर तथा शहद से भरकर बंद कर दें।

* दीपावली की रात्रि को इसका पूजन-अर्चन करके इसे अपने लॉकर या दुकान के गल्ले में रख दीजिए।

* रखने के बाद इसे खोलने की जरूरत नहीं है और ना ही और कुछ उपाय करने की।

* फिर अगली दीपावली तक इसे लॉकर या गल्ले में रखी रहने दें। दिनों दिन बढ़ती लक्ष्मी का चमत्कार आप स्वयं देखेंगे। 


 दिवाली लक्ष्मी पूजन विशेष मुहूर्त
Diwali Puja in Hindi
धन की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का पूजन प्रदोष काल (संध्या) में करना चाहिए। लक्ष्मी उपासना का यही मुख्य समय माना गया है। अमावस्या अंधकार की रात्रि है। माता लक्ष्मी को समस्त संसार व चराचर को आलौकिक करने वाली देवी माना गया है। अतः संध्या काल में दीप प्रज्ज्वलित कर लक्ष्मी पूजन करने का उत्तम समय है।
पूर्वाभिमुख होकर करें पूजन : दिवाली पर माता लक्ष्मी के साथ लोक परंपरा अनुसार गुजरी के पूजन का महत्व है। माता लक्ष्मी का पूजन पूर्वाभिमुख होकर करना चाहिए। पूजन के समय सपरिवार माता की आराधना करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजन कभी भी नहीं करना चाहिए।
Diwali Puja in Hindi
सोलह दीप प्रज्ज्वलित करें : लक्ष्मी पूजन के समय सोलह दीपक प्रज्ज्वलित करना चाहिए। माता लक्ष्मी से पूर्व दीप पूजन करें। पश्चात इन दीपों को घर के द्वार, रसोई, बाथरूम, पंडेरी (जहां जल पात्र रखे जाते हैं), छत, घर के देव स्थान तथा मंदिर में रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त श्रद्घा व सामर्थ्य अनुसार दीपक लगाए जा सकते हैं।

पति के पूर्व जागती है पत्नी : दीपावली पर माता लक्ष्मी का पूजन धर्म व संस्कृति के साथ भारतीय परंपरा के महत्व को भी प्रतिपादित करता है। भारतीय परंपरा में पति से पूर्व पत्नी जागती है तथा घर की साफ-सफाई कर पति को जगाती है।

उसी अनुक्रम में दिवाली को देखा जा सकता है। दिवाली पर लक्ष्मी पूजन होता है अर्थात माता लक्ष्मी पहले जाग जाती है। दिवाली से ग्यारह दिन पश्चात देवउठनी एकादशी आती है। धर्म शास्त्र की मान्यता अनुसार उस दिन भगवान श्री विष्णु जागते हैं।


Diwali Puja in Hindi
दीपावली पूजन विशेष मुहूर्त

प्रदोष समय- संध्या 5.50 से 7.02 बजे तक
प्रातः 6.32 से 9.22 बजे तक लाभ-अमृत
प्रातः 10.47 से 12.12 बजे तक शुभ
अपराह्न 3.02 से 5.05 बजे तक चंचल, लाभ
रात्रि 7.25 से 12.10 बजे तक शुभ, अमृत, चंचल
रात्रि 3.20 से 4 .55 बजे तक लाभ

स्थिर वृषभ लग्न
रात्रि 7.08 से 9.07 बजे त

सिंह स्थिर लग्न
रात्रि 1.35 से 3.47 बजे तक।

खरीददारी के लिए शुभ है धनतेरस
Dhanteras shopping

पुष्य नक्षत्र के बाद अब अगली खरीददारी अब धनतेरस को होगी। पर्व प्रधान होने के कारण पूरा दिन खरीददारी के लिए मंगलकारी माना जाता है, इसलिए लोग खरीददारी के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे हैं।

धनतेरस से पहले गुरुवार को पुष्य नक्षत्र होने के कारण लोगों ने जमकर खरीददारी की। माना जाता है कि पुष्य नक्षत्र में किसी भी सामान की खरीददारी फलदायी और शुभ होता है, इसके बावजूद कई लोग पुष्य नक्षत्र में खरीददारी से चूक गए। अब उनकी मंशा धनतेरस में खरीददारी करने की है।

पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार अलग-अलग दिन में तिथि और नक्षत्र के योग के आधार पर खरीददारी के लिए शुभ होता है। किसी दिन की तिथि उत्तम होती है, तो किसी दिन नक्षत्रों का योग रहता है।
Dhanteras shopping
इस साल पुष्य नक्षत्र गुरुवार को पड़ने के कारण तिथि और नक्षत्र दोनों उत्तम रहा है। इस तिथि में सोना-चांदी, जमीन, मकान-दुकान, वाहन आदि की खरीददारी शुभ होता है। इसे लोग फलदायी मानते हैं।

पुष्य नक्षत्र के बाद धनतेरस को खरीददारी के उत्तम फल है। यह दिन पर्व प्रधान है। धनतेरस का पूरा दिन खरीददारी के लिए उत्तम है। इस दिन खरीददारी मंगलकारी होता है।

हालांकि कि कुछ लोग धनतेरस में भी निश्चित समय देखते हैं, लेकिन इसका कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि धनतेरस में पूरा दिन खरीददारी के लिए शुभ होता है।
 धनतेरस
प्रचलित कथा के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने देवताओं को अमृतपान कराकर अमर कर दिया था। अतः वर्तमान संदर्भ में भी आयु और स्वस्थता की कामना से धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन भी किया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन उपवास रहकर यमराज की कथा का श्रवण भी करते हैं। आज से ही तीन दिन तक चलने वाला गो-त्रिरात्र व्रत भी शुरू होता है।
धनतेरस के दिन क्या करे
इस दिन धन्वंतरिजी का पूजन करें।
नवीन झाडू एवं सूपड़ा खरीदकर उनका पूजन करें।
सायंकाल दीपक प्रज्वलित कर घर, दुकान आदि को श्रृंगारित करें।
मंदिर, गौशाला, नदी के घाट, कुओं, तालाब, बगीचों में भी दीपक लगाएँ।
यथाशक्ति ताँबे, पीतल, चाँदी के गृह-उपयोगी नवीन बर्तन व आभूषण क्रय करते हैं।
हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर तीन बार अपने शरीर पर फेरें।
कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआँ, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाएँ।

धनतेरस पूजन में क्या करे
(अ) कुबेर पूजन
शुभ मुहूर्त में अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नई गादी बिछाएँ अथवा पुरानी गादी को ही साफ कर पुनः स्थापित करें।
पश्चात नवीन बसना बिछाएँ।
सायंकाल पश्चात तेरह दीपक प्रज्वलित कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करते हैं।

कुबेर का ध्या
निम्न ध्यान बोलकर भगवान कुबेर पर फूल चढ़ाएँ -
श्रेष्ठ विमान पर विराजमान, गरुड़मणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा एवं वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृत तुंदिल शरीर वाले, भगवान शिव के प्रिय मित्र निधीश्वर कुबेर का मैं ध्यान करता हूँ।
इसके पश्चात निम्न मंत्र द्वारा चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें -
'यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ।'

इसके पश्चात कपूर से आरती उतारकर मंत्र पुष्पांजलि अर्पित करें।
(ब) यम दीपदा
तेरस के सायंकाल किसी पात्र में तिल के तेल से युक्त दीपक प्रज्वलित करें।
पश्चात गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन कर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके यम से निम्न प्रार्थना करें-

'मृत्युना दंडपाशाभ्याम्‌ कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात्‌ सूर्यजः प्रयतां मम

अब उन दीपकों से यम की प्रसन्नतार्थ सार्वजनिक स्थलों को प्रकाशत करें।

इसी प्रकार एक अखंड दीपक घर के प्रमुख द्वार की देहरी पर किसी प्रकार का अन्न (साबूत गेहूँ या चावल आदि) बिछाकर उस पर रखें। (मान्यता है कि इस प्रकार दीपदान करने से यम देवता के पाश और नरक से मुक्ति मिलती है।)

यमराज पूज
इस दिन यम के लिए आटे का दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार पर रखें।
रात को घर की स्त्रियाँ दीपक में तेल डालकर चार बत्तियाँ जलाएँ।
जल, रोली, चावल, गुड़, फूल, नैवेद्य आदि सहित दीपक जलाकर यम का पूजन करें।