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बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी दिवस विशेष : कोई खतरा नहीं है हिन्दी को

हर साल हिन्दी दिवस आता है, चला जाता है। हर साल सरकारी दफ्तरों में, स्वायत्त संस्थाओं में हिन्दी को लेकर कुछ सभाएँ हो जाती हैं। बैंकों में कुछ बातें हो जाती हैं। पब्लिक सेक्टर संस्थानों में कुछ हिन्दी-हरकत हो जाती है। कवि सम्मेलन टाइप कुछ हो जाता है। हिन्दी की समस्याओं पर चिंता कर ली जाती है।

हिन्दी राष्ट्रभाषा बताई जाती है जबकि वह राजभाषा मात्र है और राष्ट्रभाषा व राजभाषा में भेद है। हिन्दी प्रेमी लोग उसे राष्ट्रभाषा ही कहते हैं। तकनीकी तौर पर वह भारत की एक भाषा है और राजभाषा होने के कारण उसे केंद्र सरकार का एक हद तक समर्थन प्राप्त है। पब्लिक सेक्टरों में हिन्दी अधिकारी होता है वह इसीलिए।

उनके दफ्तरों में 'हिन्दी राष्ट्रभाषा है', 'हिन्दी में कामकाज करना चाहिए' ऐसे बोर्ड भी लगे होते हैं। कही-कहीं महात्मा गांधी का या अन्य किसी महापुरुष का हिन्दी को लेकर दिया गया वक्तव्य भी लिखा होता है। लेकिन हिन्दी वालों का रोना फिर भी नहीं थमता। हर हिन्दी दिवस पर हर कहीं हिन्दी के बिगड़ते रूप पर विद्वान चिंता करते हैं। लोकल प्रतिभाओं को इनाम आदि देते हुए वे दो-तीन बातें कॉमन कहते हैं : 'हिन्दी में अंगरेजी आ रही है। यह मीडिया ने किया है, बाजार ने किया है। यह हिन्दी साहित्यिक हिन्दी नहीं है। हमारे बच्चे हिन्दी को पसंद नहीं कर पा रहे हैं। हिन्दी वाले अपने बच्चों को अंगरेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, और हिन्दी की चिंता करते हैं। यह चिंता झूठी है, इत्यादि।' ऐसी चिंताओं को हर कहीं सुना जा सकता है।
हिन्दी को खतरा पैदा हो रहा है। यह थीम शाश्वत सी बन चली है। लेकिन तथ्य एकदम अलग बात कहते हैं। तथ्य यह है कि हिन्दी लगातार बढ़ रही है, फैल रही है और वह विश्वभाषा बन चली है। उसकी 'रीच' हर महाद्वीप में है और उसका बाजार हर कहीं है। हमारी फिल्मों के गानों के एलबम अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, योरप कहीं भी मिल सकते हैं और फिल्में एक साथ विश्व की कई राजधानियों में रिलीज होती हैं।

भारतवंशी हिन्दी मूल के लोग दुनिया के हर देश में रहते हैं और उनकी हिन्दी इस हिन्दी जैसी ही है। कहीं-कहीं उसकी लिपि रोमन है लेकिन हिन्दी सर्वत्र नजर आती है। चीनी भाषा के बाद दूसरी भाषा हिन्दी नजर आती है, ऐसे आंकड़े कई विद्वान दे चुके हैं। अब तो अमेरिकी प्रशासन अपने यहाँ हिन्दी को सिखाना चाहता है। भारत में कोई तैंतीस-चौतीस करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है ऐसा सन्‌ 91 के सेंसस ने कहा है।

2001 का सेंसस यानी भाषा का नया सर्वे अभी तक नहीं आ पाया है, लेकिन आज की डेट में हम आसानी से उसमें पांच फीसदी की बढ़ोतरी तो कर ही सकते हैं। यानी आज हिन्दी चालीस करोड़ से कुछ ही कम की मातृभाषा कही जा सकती है। हिन्दी का दूसरा स्तर हिन्दी बोलनेवालों का है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। हिन्दी की व्याप्ति कितनी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि आप दक्षिणी प्रदेशों में जैसे केरल में हिन्दी को दूसरी भाषा की तरह बरता जाता देखते हैं।
आंध्र, कर्नाटक में कन्नड़ के साथ हिन्दी मौजूद है। तमिलनाडु तक में अब हिन्दी का वैसा विरोध नहीं है जैसा कि सातवें दशक में हुआ था। अब तो तमिल सांसद हिन्दी सीखने की बात करने लगे हैं। मीडिया की मुख्य भाषा हिन्दी है। हिन्दी मीडिया अंगरेजी मीडिया से कहीं आगे है। नए राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण में पहले पांच सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार हिन्दी के हैं। एक अंगरेजी का है, एक मलयालम का है, एक मराठी का और एक तेलुगु का है। एक बांग्ला का भी है।
हिन्दी के सकल मीडिया की रीच इन तमाम भाषाई मीडिया से कई गुनी ज्यादा है। हिन्दी की स्वीकृति अब सर्वत्र है। ऐसा हिन्दी दिवसों के जरिए नहीं हुआ, न हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से हुआ है। ऐसा इसलिए हुआ है कि हिन्दी जनता और मीडिया का नया रिश्ता बना है। यह बाजार ने बनाया है जिसे हिन्दी के विद्वान कोसते नहीं थकते।

मीडिया की हिन्दी संचार की जबर्दस्त हिन्दी है। इतिहास में इतने विकट, व्यापक एवं विविध स्तर के संचार की हिन्दी कभी नहीं रही। वह साहित्यिक हिन्दी रहकर संदेश, उपदेश और सुधार की भाषा भर बनी रही। प्रिंट मीडिया ने उसे एक विस्तार दिया, लेकिन साक्षरों के बीच ही। रेडियो, फिल्मों और टीवी ने उसे वहां पहुंचाया जहां हिन्दी का निरक्षर समाज रहता है, उसे एक नई भाषा दी है जो म्युजिकल है। जिसमें एक से एक हिट गाने आते हैं जिन्हें सुनकर पैर थिरकने लगते हैं।
हिन्दी दिवस विशेष
हिन्दी टीवी के समाचारों से लेकर मनोरंजन की सबसे बड़ी भाषा है। वह इंटरनेट, मोबाइली चैट में आकर गिटपिट की भाषा बनी है। भले उसकी वर्तनी रोमन हो चली हो। वहां हिन्दी-अँगरेजी का नया निराला मिक्स मिलता है। रही कसर एफएम चैनलों की हिन्दी ने पूरी कर दी है। अब वह तेज गति से दौड़ती हुई फर्राटेदार मनोरंजक भाषा है जिसमें चुटकुले मजाक, गंभीर बातें और संगीत बजता है।

इतनी बोली जाने वाली भाषा दूसरी नहीं है। इसका कारण हिन्दी का अपना लचीला स्वभाव है, उसमें दूसरी भाषाओं को समा लेने की अद्भुत क्षमता है। आज उसके कोश में मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम तक के शब्द मिक्स होकर आते-जाते हैं।

रीमिक्स की भाषा बनकर उसने सिद्ध कर दिया है कि स्पानी या लेटिनी या अंगरेजी भाषा के साथ उसकी कोई समस्या नहीं है। वे संग-संग चल सकती हैं। और यह सब हिन्दी भाषा को एक नई व्याप्ति देता है, जो अभूतपूर्व है।

वह हिन्दी के एक नए जन सांस्कृतिक क्षेत्र को बताता है। जिसमें एक मिक्स करती हिन्दी रहती है, जो शुद्ध नहीं है और जो बात उसके लिए लाभ कर रही है। शुद्ध भाषा मरणासन्न हो जाती है। बहता नीर अगर भाषा है तो उसमें बहुत कुछ मिलता रहता है और बहाव उसे साफ करता रहता है, मैला नीचे बैठ जाता है और काम का साफ पानी ऊपर रह जाता है हिन्दी इस मानी में नई सफाई लेकर आई है।

साहित्यकार किस्म के लोग इस हिन्दी का खाते हैं लेकिन इसको दूषित बताते हैं। कारण है उनका सोच अभी तक हिन्दी को किताबी और साहित्यिक मानता है जबकि कोई भी भाषा जनसंचार की भाषा बने बिना आगे नहीं बढ़ती। वह जितना विविध संचार करने में क्षमतावान होगीउतनी ही बढ़ेगी। उसमें तमाम लोग संवाद करें ऐसी भाषा आगे ही बढ़ेगी।

हिन्दी इसीलिए आगे बढ़ी है और बढ़ रही है। इसके पीछे हिन्दी भाषी जनता की जरूरतों का बल है। हिन्दी जनता सबसे बड़ी उपभोक्ता जमात है। उसे संबोधित करने के लिए कॉर्पोरेट दुनिया विज्ञापन हिन्दी में पहले बनवाती है। यही हिन्दी की गुरुत्वाकर्षकता है।

वह कॉर्पोरेट के लिए आकर्षक और सबसे बड़ा बाजार देती है। कंपनियां उसमें संवाद करती हैं। ब्रांड करती हैं। इससे एक विनियम की नई हिन्दी बनी है। साहित्य भी मरा नहीं है, वह छोटी पत्रिकाओं में रह रहा है। वही उसकी जगह भी थी।

साहित्यकार अब संख्या में ज्यादा हैं चाहे वे खराब हिन्दी ही लिखते हों। तब खतरे की लॉबी बनाना क्या तर्कसंगत है। हिन्दी दिवस मनाएं न मनाएं कम से कम इस पैरानॉइया से तो मुक्त हों जो हर वक्त हिन्दी पर खतरा मंडराता देखने का आदी है। 

 'हिन्दी का गला घुट रहा है!
अंग्रेज़ी-पुच्छलतारे नुमा व्यक्ति जब बातचीत में हिन्दी के शब्दों के अंत में जानबूझ कर व्यर्थ में ही 'आ' की पूंछ लगा कर उसका सौंदर्य नष्ट कर देते हैं, जब जी टीवी द्वारा इंग्लैंड में आयोजित एक सजीव कार्यक्रम में जहां लगभग 100 हिन्दी-भाषी वाद-विवाद में भाग ले रहे हों और एक हिन्दू भारतीय प्रौढ़ सज्जन जब गर्व से सिर उठा कर 'हवन कुंड' को 'हवना कुंडा' कह रहा हो तो हिन्दी भाषा कराहने लगती है, उसका गला घुटने लगता है।
यह ठीक है कि अधिकांश कार्यवाही अंग्रेजी में ही चल रही थी किंतु अंग्रेजी में बोलने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें हिन्दी शब्दों को कुरूप बना देने का अधिकार मिल गया हो। वे यह भी नहीं सोचते कि इस प्रकार विकृत उच्चारण से शब्दों के अर्थ और भाव तक बदल जाते हैं। 'कुंड' और 'कुंडा' दोनों शब्द भिन्न संज्ञा के द्योतक हैं।

श्रीमान, सुना है यहां एक संस्था या केंद्र है जहां योग की शिक्षा दी जाती है, आप बताने का कष्ट करेंगे कि कहां है?' 'आपका मतलब है योगा-सेंटर?' महाशय ने तपाक से अंग्रेजी-कूप में से मंडूक की तरह उचक कर 'योग' शब्द का अंग्रेजीकरण कर 'योगा' बना डाला। यह बात थी दिल्ली के करौल बाग क्षेत्र की।

यह मैं मानता हूं कि रोमन लिपि में अहिन्दी भाषियों के हिन्दी शब्दों के उच्चारण में त्रुटियां आना स्वाभाविक है, किन्तु हिन्दी-भाषी लोगों का हमारी राष्ट्र-भाषा के प्रति कर्तव्य है कि जानबूझ कर भाषा का मुख मलिन ना हो। यदि हम उन शब्दों को अंग्रेज लोगों के सामने उन्हीं का अनुसरण ना करके शब्दों का शुद्ध उच्चारण करें तो वे लोग स्वतः ही ठीक उच्चारण करके आपका धन्यवाद भी करेंगे। यह मेरा अपना निजी अनुभव है। कुछ निजी अनुभव यहां देने असंगत नहीं होंगे और आप स्वयं निर्णय कीजिए कि हम हिन्दी शब्दों के अंग्रेजीकरण उच्चारण में क्यों गर्वित होते हैं।

मैं इंग्लैंड के एक छोटे से नगर में एक स्कूल में अध्यापन-कार्य करता था। उसी स्कूल में सांयकाल के समय बड़ी आयु के लोगों के लिए भी कुछ विषयों की सुविधा थी। अन्य विषयों के साथ योगाभ्यास की कक्षा भी चलती थीं जो हम भारतीयों के लिये बड़े गर्व की बात थी। यद्यपि मेरा उस विभाग से संबंध नहीं था पर उसके प्रिंसिपल मुझे अच्छी तरह जानते थे।

योग की कक्षाएं एक भारतीय शिक्षक लेते थे जिन्होंने हिन्दी-भाषी उत्तर प्रदेश में ही शिक्षा प्राप्त की थी, हठयोग का बहुत अच्छा ज्ञान था। मुझे भी हठयोग में रुचि थी, इसीलिए उनसे अच्छी जान-पहचान हो गई थी। एक बार उन्हें किसी कारण एक सप्ताह के लिए कहीं जाना पड़ा तो प्रिंसिपल ने पूछा कि मैं यदि एक सप्ताह के लिए योग की कक्षा ले सकूं। पांच दिन के लिए दो घंटे प्रतिदिन की बात थी। मैंने स्वीकार कर कार्य आरम्भ कर दिया। 20 मिली जुली आयु के अंग्रेज पुरुष और स्त्रियां थीं।
परिचय देने के पश्चात एक प्रौढ़ महिला ने पूछा, ' आज आप कौन सा 'असाना' सिखायेंगे?' मैं मुस्कुराया और बताया कि इसका सही उच्चारण असाना नहीं, 'आसन' कहें तो अच्छा लगेगा।' उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, कहने लगीं, 'मिस्टर आ. ने तो ऐसा कभी भी नहीं कहा। वे तो सदैव 'असाना' ही कहा करते थे।'

मैंने यह कहकर बात समाप्त कर दी कि हो सकता है मि. आ. ने आप लोगों की सुगमता के लिए ऐसा कह दिया होगा। महिला ने शब्द को सुधारने के लिए कई बार धन्यवाद किया। मूल कार्य के साथ जितने भी आसन,मुद्राएं और क्रियाएं उन्होंने श्री आ. के साथ सीखी थीं, उनके सही उच्चारण भी सुधारता गया। प्रसन्नता की बात यह थी कि वे लोग हिन्दी के उच्चारण बिना किसी कठिनाई के बोल सकते थे। 'त' और 'द' बोलने में उन्हें आपत्ति अवश्य थी जिसको पचाने में कोई आपत्ति नहीं थी। जब श्री आ. वापस आकर अपने विद्यार्थियों से मिले तो अगले दिन मुझे मिलने आए और हंसते हुए कहने लगे,'यह कार्य तो मुझे आरम्भ में ही कर देना चाहिए था। इसके लिए धन्यवाद!'

श्री अर्जुन वर्मा हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता हैं। गीता तो ऐसा लगता है जैसे सारे 18 अध्याय कण्ठस्थ हों। लंदन की एक हिन्दू-संस्था के एक विशेष कार्यक्रम के अवसर पर 'श्रीमद्भगवद्गीता' पर भाषण दे रहे थे। भारतीय, अंग्रेज और यहां तक कि ईरान के एक मुस्लिम दंपत्ति भी श्रोताओं में उपस्थित थे। स्वाभाविक है, अंग्रेज़ी भाषा में ही बोलना उपयुक्त था।
'माई नेम इज़ अर्जुन वर्मा.....'. गीता के विषयों की चर्चा करते हुए सारे पात्र अर्जुना, भीमा, नकुला, कृश्ना, दुर्योधना, भीष्मा, सहदेवा आदि बन गए। विडम्बना यह है कि वे स्वयं अर्जुन ही रहे और गीता के अर्जुन 'अर्जुना' बन गए। बाद में जब भोजन के समय अकेले में मैंने इस बात पर संक्षिप्त रूप से उनका ध्यान आकर्षित किया तो कहने लगे 'ये लोग गीता अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं तो उनके साथ ऐसा ही बोलना पड़ता है। 'मैंने कहा,'वर्मा जी आप तो संस्कृत और हिन्दी में ही पढ़ते हैं।' वर्मा जी ने हंसते हुए यह कहकर बात समाप्त कर दी,' मैं आपकी बात पूर्णतयः समझ रहा हूं, मैं आपकी बात को ध्यान में रखूंगा।'

अपने एक मित्र का यह उदाहरण अवश्य देना चाहूंगा। बात, फिर वही लंदन की है। आप जानते ही हैं कि 'हरे कृष्ण' मंदिर विश्व के कोने कोने में मिलेंगे जिनका सारा कार्य-भार विभिन्न देशों के कृष्ण-भक्तों ने सम्भाला हुआ है। गौर वर्ण के लोग भी अपनी पूरी सामर्थ्यानुसार अपना योग दे रहे हैं। मेरे मित्र (नाम आगे चलकर पता लग जाएगा) इस मंदिर में प्रवचन सुनकर आए थे। मैंने पूछा, ' भई आज किस विषय पर चर्चा हो रही थी। हमें भी इस ज्ञान-गंगा में यहीं पर गोता लगवा दो।' कहने लगे,'आज सूटा के विषय में ,...' मैंने बीच में ही रोक कर पूछा,'भई, यह सूटा कौन है?' कहने लगे,'अरे वही, तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे जानते ही नहीं।

दिल्ली में मेरी माता जी जब हर माह श्री सत्यनारायण की कथा करवातीं थी, तुम हमेशा आकर सुनते थे। कथा के पहले ही अध्याय में सूटा ही तो...' मैंने फिर रोक कर उनकी बात टोक दी, 'अच्छा, तुम श्री सूत जी की बात कर रहे हो!' फिर अपनी बात सम्भालते हुए कहने लगे, 'यार, ये अंग्रेज़ लोग उन्हें सूटा ही कहते हैं।' मैंने फिर कहा,' देखो, तुम्हारा नाम 'अरुण' है, यदि कोई तुम्हारे नाम में 'आ' लगा कर 'अरुणा' कहे तो यह पसंद नहीं करोगे कि कोई किसी अन्य व्यक्ति के सामने तुम्हारे नाम को इस प्रकार बिगाड़ा जाए, तुम्हें 'नर' से 'नारी' बना दे। तुम उसी समय अपने नाम का सही उच्चारण करके सुधार देंगे।' यह तो मैं नहीं कह सकता कि अरुण को मेरी बात अच्छी लगी या बुरी किंतु वह चुप ही रहे।

मैंने कहीं भी रोमन अंग्रेजी लिपि में या अंग्रेजी लेख आदि में मुस्लिम पैगम्बर और पीर आदि के नामों के विकृत रूप नहीं देखे। कहीं भी हज़रत मुहम्मद की जगह 'हज़रता मुहम्मदा' या ‘रसूल’ की जगह ‘रसूला’नहीं देखा गया। मुस्लिम व्यक्ति की तो बात ही नहीं, किसी पाश्चात्य गौर वर्ण के व्यक्ति तक को ‘मुहम्मदा’ या ‘रसूला’ बोलते नहीं सुना।
कारण यह है कि कोई उनके पीर, पैगम्बर के नामों को विकृत करके मुंह खोलने वाले का मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होने से पहले ही सीधा कर देते हैं। कभी मैं सोचता हूं, ऐसा तो नहीं कि एक दीर्घ काल तक गुलामी सह सह कर हमारे मस्तिष्क को हीनता के भाव ने यहां तक जकड़ लिया है कि कभी यदि वेदों पर चर्चा होती है तो 'मैक्समुलर' के ऋग्वेद के अनुवाद के उदाहरण देने में ही अपनी शान समझते हैं।
फिल्मी कलाकार, निर्माता, निर्देशक, नेता आदि यहां तक कि जब वे भारतीयों के लिए भी किसी वार्ता में दिखाई देते हैं, तो हिन्दी में बोलना अपनी शान में धब्बा समझते हैं। ऐसा लगता है कि उर्दू या हिन्दी तो उनके लिए किसी सुदूर अनभिज्ञ देश की भाषा है। यह देखा जा रहा है कि हर क्षेत्र में व्यक्ति जैसे जैसे अपने कार्य में सफलता प्राप्त करके ख्याति के शिखर के समीप आ जाता है, उसे अपनी मां को मां कहने में लज्जा आने लगती है।
भारत में बी.बी.सी. संवाददाता पद्म भूषण सम्मानित सर मार्क टली एक वरिष्ट पत्रकार हैं। उन्हें उर्दू और हिन्दी का अच्छा ज्ञान है। भारतीयों का हिन्दी भाषा के प्रति उदासीनता का व्यवहार देख कर उन्होंने कहा था,'... जो बात मुझे अखरती है वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का विराजमान! क्योंकि मुझे यकीन है कि बिना भारतीय भाषाओं के 'भारतीय संस्कृति' जिंदा नहीं रह सकती। दिल्ली में जहां रहता हूं, उसके आसपास अंग्रेजी पुस्तकों की तो दर्जनों दुकानें हैं, हिन्दी की एक भी नहीं।
हकीकत तो यह है कि दिल्ली में मुश्किल से ही हिन्दी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी।' लज्जा आती है कि एक विदेशी के मुख से ऐसी बात सुनकर भी ख्याति के शिखर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सफलकारों के कान में जूं भी नहीं रेंगती। लोग कहते हैं कि हमारे नेता दूसरे देशों में भाषण देते हुए अंग्रेजी का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि वहां के लोग हिन्दी नहीं जानते।

मैं यही कहूंगा कि रूस के व्लाडिमिर पूतिन, फ्रांस के निकोलस सरकोजी, चीन के ह्यू जिन्ताओ और जर्मनी के होर्स्ट कोलर आदि कितने ही देशों के नेता जब भी दूसरे देशों में जाते हैं तो गर्व से भाषांतरकार को मध्य रख अपनी ही भाषा में बातचीत करते हैं। ऐसा नहीं है कि ये लोग अंग्रेजी से अनभिज्ञ हैं किंतु उनकी अपनी भाषा का भी अस्तित्व है।

हिन्दी को बचाने के लिए एक हो जाएँ 
मीडिया की दुनिया में इन दिनों भाषा का सवाल काफी गहरा हो गया है। मीडिया में जैसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उसे लेकर शुद्धता के आग्रही लोगों में काफी हाहाकार व्याप्त है। चिंता हिन्दी की है और उस हिन्दी की जिसका हमारा समाज उपयोग करता है। बार-बार ये बात कही जा रही है कि हिन्दी में अंग्रेजी की मिलावट से हिन्दी अपना रूप-रंग-रस और गंध खो रही है। सो, हिन्दी को बचाने के लिए एक हो जाइए।
हिन्दी हमारी भाषा के नाते ही नहीं,अपनी उपयोगिता के नाते भी आज बाजार की सबसे प्रिय भाषा है। आप लाख अंग्रेजी के आतंक का विलाप करें। काम तो आपको हिन्दी में ही करना है, ये मरजी आपकी कि आप अपनी स्क्रिप्ट देवनागरी में लिखें या रोमन में। यह हिन्दी की ही ताकत है कि वह सोनिया गाँधी से लेकर कैटरीना कैफसबसे हिन्दी बुलवा ही लेती है।
उड़िया न जानने के आरोप झेलनेवाले नेता नवीन पटनायक भी हिन्दी में बोलकर ही अपनी अंग्रेजी न जानने वाली जनता को संबोधित करते हैं। इतना ही नहीं प्रणव मुखर्जी की सुन लीजिए। वे कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि उन्हें ठीक से हिन्दी बोलनी नहीं आती। कुल मिलाकर हिन्दी आज मीडिया, राजनीति, मनोरंजन और विज्ञापन की प्रमुख भाषा है।
हिंदुस्तान जैसे देश को एक भाषा से सहारे संबोधित करना हो तो वह सिर्फ हिन्दी ही है। यह हिन्दी का अहंकार नहीं उसकी सहजता और ताकत है। मीडिया में जिस तरह की हिन्दी का उपयोग हो रहा है उसे लेकर चिंताएँ बहुत जायज हैं किंतु विस्तार के दौर में ऐसी लापरवाहियाँ हर जगह देखी जाती हैं।

कुछ अखबार प्रयास पूर्वक अपनी श्रेष्टता दिखाने अथवा युवा पाठकों का ख्याल रखने के नाम पर हिंग्लिश परोस रहे हैं जिसकी कई स्तरों पर आलोचना भी हो रही है। हिंग्लिश का उपयोग चलन में आने से एक नई किस्म की भाषा का विस्तार हो रहा है। किंतु आप देखें तो वह विषयगत ही ज्यादा है।

लाइफ स्टाइल, फिल्म के पन्नों, सिटी कवरेज में भी लाइट खबरों पर ही इस तरह की भाषा का प्रभाव दिखता है। चिंता हिन्दी समाज के स्वभाव पर भी होनी चाहिए कि वह अपनी भाषा के प्रति बहुत सम्मान भाव नहीं रखता, उसके साथ हो रहे खिलवाड़ पर उसे बहुत आपत्ति नहीं है।

हिन्दी को लेकर किसी तरह का भावनात्मक आधार भी नहीं बनता, न वह अपना कोई ऐसा वृत्त बनाती है जिससे उसकी अपील बने। हिन्दी की बोलियाँ इस मामले में ज्यादा समर्थ हैं क्योंकि उन्हें क्षेत्रीय अस्मिता एक आधार प्रदान करती है। हिन्दी की सही मायने में अपनी कोई जमीन नहीं है।

जिस तरह भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, बधेली, गढ़वाली, मैथिली,बृजभाषा जैसी तमाम बोलियों ने बनाई है। हिन्दी अपने व्यापक विस्तार के बावजूद किसी तरह का भावनात्मक आधार नहीं बनाती। सो इसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ किसी का दिल भी नहीं दुखाती।

मीडिया और मनोरंजन की पूरी दुनिया हिन्दी के इसी विस्तारवाद का फायदा उठा रही है किंतु जब हिन्दी को देने की बारी आती है तो ये भी उससे दोयम दर्जे का ही व्यवहार करते हैं। यह समझना बहुत मुश्किल है कि विज्ञापन, मनोरंजन या मीडिया की दुनिया में हिन्दी की कमाई खाने वाले अपनी स्क्रिप्ट इंग्लिश में क्यों लिखते हैं।

देवनागरी में किसी स्क्रिप्ट को लिखने से क्या प्रस्तोता के प्रभाव में कमी आ जाएगी, फिल्म फ्लॉप हो जाएगी या मीडिया समूहों द्वारा अपने दैनिक कामों में हिन्दी के उपयोग से उनके दर्शक या पाठक भाग जाएँगें। यह क्यों जरूरी है कि हिन्दी के अखबारों में अंग्रेजी के स्वनामधन्य लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकारों के तो लेख अनुवाद कर छापे जाएँ उन्हें मोटा पारिश्रमिक भी दिया जाए किंतु हिन्दी में मूल काम करने वाले पत्रकारों को मौका ही न दिया जाए।

हिन्दी के अखबार क्या वैचारिक रूप से इतने दरिद्र हैं कि उनके अखबारों में गंभीरता तभी आएगी जब कुछ स्वनामधन्य अंग्रेजी पत्रकार उसमें अपना योगदान दें। यह उदारता क्यों। क्या अंग्रेजी के अखबार भी इतनी ही सदाशयता से हिन्दी के पत्रकारों के लेख छापते हैं।

पूरा विज्ञापन बाजार हिन्दी क्षेत्र को ही दृष्टि में रखकर विज्ञापन अभियानों को प्रारंभ करता है किंतु उसकी पूरी कार्यवाही देवनागरी के बजाए रोमन में होती है। जबकि अंत में फायनल प्रोडक्ट देवनागरी में ही तैयार होना है। गुलामी के ये भूत हमारे मीडिया को लंबे समय से सता रहे हैं। इसके चलते एक चिंता चौतरफा व्याप्त है।

यह खतरा एक संकेत है कि क्या कहीं देवनागरी के बजाए रोमन में ही तो हिन्दी न लिखने लगी जाए। कई बड़े अखबार भाषा की इस भ्रष्टता को अपना आर्दश बना रहे हैं। जिसके चलते हिन्दी कोई सरमायी और सकुचाई हुई सी दिखती है। शीर्षकों में कई बार पूरा का शब्द अंग्रेजी और रोमन में ही लिख दिया जा रहा है। जैसे- मल्लिका का BOLD STAP या इसी तरह कौन बनेगा PM जैसे शीर्षक लगाकर आप क्या करना चाहते हैं।

कई अखबार अपने हिन्दी अखबार में कुछ पन्ने अंग्रेजी के भी चिपका दे रहे हैं। आप ये तो तय कर लें यह अखबार हिन्दी का है या अंग्रेजी का। रजिस्ट्रार आफ न्यूजपेपर्स में जब आप अपने अखबार का पंजीयन कराते हैं तो नाम के साथ घोषणापत्र में यह भी बताते हैं कि यह अखबार किस भाषा में निकलेगा क्या ये अंग्रेजी के पन्ने जोड़ने वाले अखबारों ने द्विभाषी होने का पंजीयन कराया है।
आप देखें तो पंजीयन हिन्दी के अखबार का है और उसमें दो या चार पेज अंग्रेजी के लगे हैं। हिन्दी के साथ ही आप ऐसा कर सकते हैं। संभव हो तो आप हिंग्लिश में भी एक अखबार निकालने का प्रयोग कर लें। संभव है वह प्रयोग सफल भी हो जाए किंतु इससे भाषायी अराजकता तो नहीं मचेगी।
हिन्दी में जिस तरह की शब्द सार्मथ्य और ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन पर अपनी बात कहने की ताकत है उसे समझे बिना इस तरह की मनमानी के मायने क्या हैं। मीडिया की बढ़ी ताकत ने उसे एक जिम्मेदारी भी दी है। सही भाषा के इस्तेमाल से नई पीढ़ी को भाषा के संस्कार मिलेंगें। बाजार में हर भाषा के अखबार मौजूद हैं, मुझे अंग्रेजी पढ़नी है तो मैं अंग्रेजी के अखबार ले लूँगा, वह अखबार नहीं लूँगा जिसमें दस हिन्दी के और चार पन्ने अंग्रेजी के भी लगे हैं।

इसी तरह मैं अखबार के साथ एक रिश्ता बना पाता हूँ क्योंकि वह मेरी भाषा का अखबार है। अगर उसमें भाषा के साथ खिलवाड़ हो रहा है तो क्या जरूरी है मैं आपके इस खिलवाड़ का हिस्सा बनूँ। यह दर्द हर संवेदनशील हिन्दी प्रेमी का है। हिन्दी किसी जातीय अस्मिता की भाषा भले न हो यह इस महादेश को संबोधित करनेवाली सबसे समर्थ भाषा है। इस सच्चाई को जानकर ही देश का मीडिया, बाजार और उसके उपादान अपने लक्ष्य पा सकते हैं। क्योंकि हिन्दी की ताकत को कमतर आँककर आप ऐसे सच से मुँह चुरा रहे हैं जो सबको पता है।
 

1 टिप्पणी:

Kuntal !~ Kittu~! ने कहा…

पढ़ कर हर्ष की अनुभूति हुई और साथ ही अपन्से शब्दों के ज्ञान को वेर्धित करने का अवसर मिला, धन्यवाद् :)