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सोमवार, 14 नवंबर 2011

बाल दिवस

चाचा नेहरू
14 नवंबर को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन होता है। इसे बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और बच्चे उन्हें चाचा नेहरू पुकारते थे।

बाल दिवस बच्चों को समर्पित भारत का राष्ट्रीय त्योहार है। देश की आजादी में भी नेहरू का बड़ा योगदान था।

प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश का उचित मार्गदर्शन किया था। बाल दिवस बच्चों के लिए महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन स्कूली बच्चे बहुत खुश दिखाई देते हैं। वे सज-धज कर विद्यालय जाते हैं। विद्यालयों में बच्चे विशेष कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

वे अपने चाचा नेहरू को प्रेम से स्मरण करते हैं। बाल मेले में बच्चे अपनी बनाई हुई वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाते हैं। इसमें बच्चे अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। नृत्य, गान, नाटक आदि प्रस्तुत किए जाते हैं। नुक्कड़ नाटकों के द्वारा आम लोगों को शिक्षा का महत्व बताया जाता है।
Children
बच्चे देश का भविष्य हैं। इसलिए हमें सभी बच्चों की शिक्षा की तरफ ध्यान देना चाहिए। बच्चों के रहन-सहन के स्तर ऊंचा उठाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्हें स्वस्थ, निर्भीक और योग्य नागरिक बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह बाल दिवस का संदेश है।
बाल दिवस के अवसर पर केंद्र तथा राज्य सरकार बच्चों के भविष्य के लिए कई कार्यक्रमों की घोषणा करती है।

बाल श्रम रोधी कानूनों को सही मायनों में पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए। अनेक कानून बने होने के बावजूद बाल श्रमिकों की संख्‍या में वर्ष दर वर्ष वृद्धि होती जा रही है। इन बच्चों का सही स्थान कल-कारखानों में नहीं बल्कि स्कूल है।
सिर्फ रस्म अदायगी है बाल दिवस!
चाचा नेहरू
श्री जवाहरलाल नेहरू बच्चों के चाचा नेहरू थे और वे बच्चों की चमकीली आंखों में भारत का उज्जवल भविष्य देखते थे। बच्चों के नाम पर नेहरूजी के जन्मदिन को बाल दिवस कहा गया।

आज नेहरूजी होते तो अपनी वृद्ध सपनीली आंखों से देखते कि जिन सपनों की वे बात करते थे, आज वे कहीं नहीं बचे है। राजनीति से 'सेवा' शब्द गायब हो चुका है। क्या कोई ऐसा क्षेत्र बचा है जहाँ कोई बड़ा घोटाला नहीं हुआ हो? ऐसे में इस वर्ष बच्चों से क्या कहें? वे इस बाल दिवस पर क्या सीखें?

वे किससे प्रेरणा लें? वे क्यों सच बोलें? वे क्यों किसी ऊंचे आदर्श पर यकीन करें? जबकि वे हर रोज देखते हैं कि जो उन्हें जिस आदर्श पर चलने की प्रेरणा देता है दरअसल वह उसी वक्त, एन उन्हीं के सामने उस आदर्श की हत्या कर रहा होता है। भ्रष्टाचार, झूठ और फरेब में स्वयं लिप्त रहकर आखिर हम उससे बच्चों को बचाने की बात कैसे कर सकते हैं। आखिर इस ढोल को पीटने से क्या होगा कि बच्चे संस्कारविहीन हो रहे हैं?

आखिर किसे चिंता है कि इस देश के बच्चों का भविष्य क्या हो? उनकी शिक्षा की व्यवस्था कैसी हो? उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे मिलें? कैसे उनके माता-पिता के रोजगार और आय के साधन बढ़ाए जाएं जिससे किसी भी बच्चे को बाल-मजदूर न बनना पड़े।
बाल दिवस
किसी बच्चे को खुले आसमान के नीचे न सोना पड़े। हमारी लाचारी, हमारी बदहाली के लिए हो सकता है हमारी जनसंख्या जिम्मेदार हो, मगर वे लोग भी जिम्मेदार हैं जो सुनहरे सपने तो दिखाते हैं लेकिन चिकनी चुपड़ी खुद हजम करते हैं।

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि बच्चों पर इसलिए कोई ध्यान नहीं देता है कि वे वोट बैंक नहीं है। लेकिन आज नहीं तो कल बच्चों पर तो ध्यान देना ही होगा। जो भी योजनाएं बनती हैं उनका कितना प्रतिशत बच्चों तक सचमुच पहुंचा? क्या कभी किसी ने यह पता किया है?

एक सरकार आती है, वह दसवीं तक के बच्चों को किताबें-कापी देने की घोषणा करती हैं, दूसरी उस घोषणा को रद्दी की टोकरी में डाल देती है। एक दिन बच्चों को दोपहर का पौष्टिक भोजन देने की घोषणा की जाती है, दूसरे दिन उसे खारिज कर दिया जाता है।

ऐसे में हर साल चाहे बाल-दिवस आए चाहे उस पर कितनी भी बड़ी-बड़ी उद्घोषणाएं हो, बच्चों का कोई भला नहीं होने वाला। आखिर ऐसी नीतियां क्यों नहीं बनाई जाती कि सरकार किसी पार्टी की आए, बच्चों के लिए पहले से चल रही कल्याणकारी योजनाओं पर कोई असर न पड़े नहीं तो बाल दिवस सिर्फ एक रस्म अदायगी भर रह सकता है।

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