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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

शून्य के चमत्कार को नमस्कार...!


अंकों के मामले में विश्व भारत का ऋणी है। भारत ने शून्य की खोज की। किसी भी व्यक्ति के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि शून्य की खोज भारत में क्यों और कैसे हुई? आवश्यकता आविष्कार की जननी है। हमारे पूर्वज जानते थे कि आने वाले समय में भारत को शून्य की बहुत आवश्यकता पड़ेगी इसीलिए उन्होंने शून्य की खोज की।

आज ऐसे बहुत से मामले हैं जो शून्य से संबंधित हैं। सरकार नव निर्माण की योजनाएं बनाती है। इनमें सड़कें बनती हैं, भवन बनते हैं, बांध, नहरें और न जाने क्या-क्या पर इनमें से अधिकांश चीजें सिर्फ कागजों पर बन कर वास्तविक आकार लेने से पूर्व शून्य में विलीन हो जाती हैं। फिर जांच होती है, आयोग बैठते हैं और परिणाम शून्य ही रहता है।
शून्य कहने को तो शून्य है परंतु शून्य का ही चमत्कार है कि यह एक से दस, दस से हजार, हजार से लाख, करोड़ कुछ भी बना सकता है। बहुत से व्यक्ति भावशून्य होते हैं। ऐसे व्यक्ति जब राजनीति में सक्रिय होते हैं तो देखते ही देखते करोड़पति बन जाते हैं।
चोर-उचक्के गली-मौहल्लों में चोरियां करते हैं। इससे बड़े स्तर की लूट को डाका कहा जाता है और राष्ट्रीय स्तर की चोरी घोटाला कहलाती है। हिंदुस्तान में सहज तरीके से तीनों तरह की चोरियां होती रहती हैं। अपराधों के आंकड़े बढ़ते जाते हैं और पुलिस की भूमिका शून्य होती जाती है।
शून्य की विशेषता है कि इसे किसी संख्या से गुणा करो अथवा भाग दो, फल शून्य ही रहेगा। महंगाई से परेशान जनता कितने ही धरने-प्रदर्शन करे अथवा मंत्रियों के चक्कर काटती फिरे, परिणाम शून्य ही रहता है। जब क्रिकेट का मौसम आता है तो दफ्तरों में हाजिरी शून्य के आसपास पहुंच जाती है।
राजनीतिज्ञ तो शून्य को अपना इष्टदेव मानते हैं। राजनीति में आने से पूर्व वे शून्य थे, अब देश व समाज को शून्य बना रहे हैं। इसीलिए इन शून्य साधकों के लिए संसद सत्र में शून्यकाल का प्रावधान रखा गया है।
उधर मठाधीश लोगों को समझा रहे हैं, साथ क्या लाया था? साथ क्या ले जाएगा? जीव शून्य से आता है, शून्य में खो जाएगा। दान कर और भवसागर से पार कर। कई लोग दान पुण्य के मामले में शून्य हैं तो कई दान पुण्य करके शून्य हो गए।
यदि बच्चे का रिपोर्ट कार्ड यदि शून्य दर्शाए तो अध्यापक की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाने से पूर्व शिक्षा पद्धति का मूल्यांकन जरूर कर लें जिसके बोझ से बालक का मस्तिष्क शून्य हो गया है। संस्कार शून्य युवा वर्ग रोजगार शून्य भी होता जा रहा है। ऐसे में आतंक के नाम पर कुछ सिरफिरे संवेदन शून्य होकर अबोध लोगों को मार रहे हैं।
पृथ्वी गोल है, शून्य भी गोल है। दुनिया में सब गोलमाल है। ऐसे में कोई शून्य के प्रभाव से बच भी कैसे सकता है।

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