देश की आशा हिंदी भाषा

समर्थक

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

गरीबी मापने का मक्कारी भरा पैमाना

 
जिस तरह भारत कृषि प्रधान देश है, उसी तरह गरीबी प्रधान देश भी है यानी भारत की बहुसंख्य आबादी गरीब है। इस जगजाहिर हकीकत के बावजूद किसी को यह ठीक-ठीक मालूम ही नहीं है कि गरीबी का यह हिंद महासागर कितना विशाल है यानी देश में गरीब आबादी का वास्तविक आँकड़ा क्या है। देश और समाज की जमीनी हकीकत से हमारे नीति-नियामकों की बेखबरी की यह इंतहा ही है।

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने लंबी ऊहापोह के बाद फैसला किया है कि 2011 की जनगणना के साथ जातियों के आँकड़े जुटाने के साथ ही गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली आबादी के आँकड़े भी जुटाए जाएँगे। इसी फैसले के तहत सरकार लगभग रुपए साढ़े तीन हजार करोड़ खर्च कर इसी महीने पूरे देश में गरीबों की पहचान के लिए गणना अभियान शुरू कर रही है। लेकिन सवाल यह खड़ा हो गया है कि सरकार किसे गरीब मानेगी।


गरीबी मापने की जो प्रचलित सरकारी पद्धति है उसे तमाम अर्थशास्त्री नकारते रहे हैं। गरीबी मापने के जो अंतरराष्ट्रीय पैमाने हैं, उनमें और हमारी सरकारी पद्धति में भी कोई साम्य नहीं है। दरअसल, सरकार में बैठे योजनाकारों द्वारा गरीबी मापने का जो पैमाना तय किया गया है, वह गरीबी को मापने से ज्यादा गरीबी को छिपाने का काम करता है। यही वजह है कि योजना आयोग द्वारा निर्धारित गरीबी की परिभाषा से सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) भी सहमत नहीं है।

योजना आयोग ने 2004-05 में बताया था कि देश में सिर्फ 27 फीसद लोग गरीब हैं। योजना आयोग द्वारा ही 2009 में गठित सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने यह आँकड़ा खारिज करते हुए बताया कि 37 फीसद भारतीय गरीब हैं, जिनमें 42 फीसद गरीब गाँवों में बसते हैं।

तेंदुलकर समिति का यह अनुमान भी हकीकत से दूर है। तेंदुलकर समिति के बाद उसी दौर में असंगठित क्षेत्र की स्थिति के अध्ययन के लिए गठित अर्जुन सेनगुप्त की सदारत वाली एक अन्य समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल आबादी के 78 फीसद हिस्से के गरीब होने का अनुमान पेश किया था। इसके बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से गठित एनसी सक्सेना की अध्यक्षता वाली समिति ने आधी यानी 50 फीसद आबादी को गरीब माना। अब योजना आयोग ने गरीबी की जो कसौटी बनाई है, वह हैरान करने वाली और निहायत ही हास्यास्पद है।

अपनी बनाई इस कसौटी को योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में भी पेश किया है। इस कसौटी के मुताबिक शहरी क्षेत्र में रुपए 578 मासिक यानी प्रतिदिन रुपए बीस से कम पर गुजर-बसर करने वाले व्यक्ति को गरीब माना जाएगा। इस रुपए 578 में दो वक्त का खाना, मकान का किराया, दवाई आदि समेत बीस मदें शामिल हैं। इसमें सब्जी-भाजी की मद में खर्च की सीमा एक रुपए बाईस पैसे प्रतिदिन है। इस खर्च सीमा में कोई व्यक्ति दो वक्त की बात तो छोड़िए, एक वक्त के लिए भी कैसे सब्जी-भाजी जुटा सकता है?

इसी तरह शहरों में मकान के किराए पर खर्च की सीमा रुपए इकतीस प्रति व्यक्ति प्रतिमाह रखी गई। ग्रामीण इलाकों के लिए तो गरीबी की कसौटी और भी सख्त है। योजना आयोग ने गाँवों में रहने वाले उन्हीं लोगों को गरीब माना है जिनका रोजाना का खर्च रुपए पंद्रह से ज्यादा न हो। इससे भी ज्यादा अतार्किक और हास्यास्पद बात यह है कि शहरी और ग्रामीण गरीबी का यह निर्धारण 2004-05 की कीमतों के आधार पर किया गया है, जबकि आज कीमतें तब के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई हैं।

जाहिर है कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से निर्देशित होने वाले हमारे योजनाकार गरीबों और गरीबी की खिल्ली उड़ा रहे हैं। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और उनकी योजनाकार मंडली की बाजीगरी देखिए कि उन्होंने गरीबी कम करने के तो कोई उपाय नहीं खोजे, जो कि वे खोजना भी नहीं चाहते हैं और न ही खोज सकते हैं पर गरीबों की संख्या कम करने और दिखाने की कई नायाब तरकीबें उन्होंने जरूर ईजाद कर ली हैं।

वैसे गरीबों की संख्या कम करने का सबसे पुराना तरीका तो वह गरीबी रेखा है जो सत्तर के दशक में इंदिरा गाँधी के गरीबी हटाओ कार्यक्रम के तहत ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति 2400 कैलोरी और शहरी इलाकों में 2100 कैलोरी के उपभोग के आधार पर गढ़ी गई थी। इसके तहत जिस भी व्यक्ति की मासिक आमदनी इस जरूरी कैलोरी का भोजन जुटाने लायक नहीं थी उसे गरीबी रेखा के नीचे माना गया था।


अब भी गरीबी मापने के लिए शहरी और ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति मासिक आमदनी की जो सीमा तय की गई है उसमें 2400 कैलोरी का भोजन तो दूर, एक वक्त का भोजन भी जुटाना मुश्किल है। इसलिए योजना आयोग द्वारा निर्धारित गरीबी की इस रेखा को अर्थशास्त्री अगर भुखमरी की रेखा कहते हैं तो इसमें गलत क्या है?

योजनाकारों द्वारा बनाई गई गरीबी मापने की यह कसौटी दरअसल गरीबी की वास्तविक तस्वीर छिपाने की फूहड़ कोशिश ही है और साथ ही देश के गरीबों के साथ शर्मनाक मजाक भी। यही वजह है कि एनएसी के सदस्य इस कसौटी को लेकर आगबबूला हैं। गरीबी मापने के अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुसार प्रतिदिन सवा डॉलर तक खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब और एक डॉलर तक खर्च करने वाले को अति गरीब माना जाता है। अगर यही मापदंड भारत में लागू किया जाए तो कैसी तस्वीर दिखाई देगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

सवाल उठता है कि आखिर हमारे योजनाकार गरीबी की असली तस्वीर पर पर्दा क्यों डालना चाहते हैं? जाहिर है कि वे ऐसा करके मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और गरीब तबके के लिए चलने वाली योजनाओं के बजट में कटौती करना चाहते हैं और सबसिडी का बोझ घटाना चाहते हैं। इसके लिए यह जरूरी है कि सरकारी आँकड़ों में गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वालों की संख्या सीमित रखी जाए लेकिन कोई कितनी ही और कैसी भी कोशिश कर ले, आम लोगों की आर्थिक हालत ऐसी चीज है जो छिपाने की लाख कोशिशों के बाद भी नहीं छिप सकती।

पिछले कुछ वर्षों से देश के चंद उद्योग घरानों की संपत्ति में हो रहा बेतहाशा इजाफा और देश के विभिन्न इलाकों में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं और भूख व कुपोषण से हो रही मौतें बता रही हैं कि किस तरह से भारत का निर्माण हो रहा है और सरकार का हाथ किसके साथ है। खुद यजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका के सिलसिले में दायर अपने हलफनामे में कहा है कि देश में प्रतिदिन कोई ढाई हजार बच्चे कुपोषण की वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं। दूसरी ओर भंडारण की बदइंतजामी, गोदामों की कमी और लापरवाही के चलते हजारों टन अनाज हर साल सड़ जाता है।

इतनी सारी कड़वी हकीकतों के बावजूद सरकार के योजनाकार गरीबों की संख्‍या सीमित बताने की फूहड़ और शर्मनाक कोशिशें कर रहें हैं। ऐसे में सारा दारोमदार मानसून सत्र में आने वाले खाद्य सुरक्षा बिल पर है, जिसमें अगर गरीबी रेखा का तर्क संगत निर्धारण होगा तो ही सरकारों की नीतियों और प्राथमिकताओं में गुणात्मक फर्क आएगा।

कोई टिप्पणी नहीं: